
सबकुछ तो तय हैं , फिर किस बात का भय हैं ?
जन्म से लकीर खींची श्मशान तक
रोटी से लेकर उस चाँद तक भागते हो
आखिर इंसान तुम क्या चाहते हो ?
खुद पे इतना घमडं हैं या किसी द्विधा में हो ?
कहीं इंसान इंसानियत भुला तो नहीं
माना की भूख होना भी प्राकृतिक धरम हैं
मगर उतनाही चाय में शक्कर , खाने में नमक
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