उन हाथों को पहचानती थी दिखता तो नहीं था उसे रात के अंधियारे में पर मालूम हो जाता था उसके स्पर्श से वो जो कोई भी था कोई ख़ून का रिश्ता था परिवार की इज्ज़त बचानी थी उसने चुप रहने की ठानी थी पर उम्र अभी उसकी छोटी थी और इज़्ज़त बचाना उसके क़द से ज़रा ऊपर थी कुछ ईंट लगाकर तलवों के नीचे अपना क़द बड़ा कर इज़्ज़त को थामे रखा था सालों साल कई सवाल छोड़ा है उसने हम सबके लिए उत्तर उसे मिले नहीं किसी से जब कभी 'रेप' होता है कहीं, किसी रोज़ हम बगलें झाँकते है बस या फिर चंद लाइनें छोड़ उत्तर के लिए काग़ज़ मे आगे बढ़ जाते हैं पर कब तक? वो तो ज़वाब माँगती रहेगी हर वक़्त