कुछ सिक्के लुढ़कते हुए
मेरे पास आये।
और मुझे एकटक देखते रहे
रुपयों ने भी कहाँ हार मानी थी
पर्स में पहले ही सेंध लगाए बैठे थे
मेंरी बेचैन रूह जैसे
इत्र लगा कर घूम रही थी बाजार में
इतने में आरजूओं ने मेरी उंगली छोड़ी
और दुपट्टे वाले की दुकान पर जा खड़ी हुईं
छुपा कर दे दिया रुपयो में
थोड़ी धूप थोड़ा पसीना।
दुपट्टा खिल रहा था मुझ पर रात भी पुरशबाब थी
और सितारें सब सो रहे थे दुप्पटे पर आकर।
कुछ आगे ही बढ़ी में कि चाँद ने टोका
काली रात को उँगली से लेकर
मेरी आँखों में लगाया औऱ मुस्कुराया।
मैं सिर उठा कर चल पड़ी।
पीछे -पीछे तक़दीर भी मेरे क़दमो के
निशानों को पहचानती हुई आई,
हाथ में गुलदस्ता लेकर
आँसू की बूंदे आँखों से बहकर
होंठो तक आ गई थी और
गले लगा कर बोल पड़ी
मुबारक हो
पहली नोकरी के लिए
आयुषी भंडारी


