
कुछ सिक्के लुढ़कते हुए
मेरे पास आये।
और मुझे एकटक देखते रहे
रुपयों ने भी कहाँ हार मानी थी
पर्स में पहले ही सेंध लगाए बैठे थे
मेंरी बेचैन रूह जैसे
इत्र लगा कर घूम रही थी बाजार में
इतने में आरजूओं ने मेरी उंगली छोड़ी
और दुपट्टे वाले की दुकान पर जा खड़ी हुईं
छुपा कर दे दिया रुपयो में
थोड़ी धूप थोड़ा पसीना।
दुपट्टा खिल रहा था मुझ पर रात भी पुरशबाब थी
और
Read More! Earn More! Learn More!
