वो आम का पेड़ मेरे बचपन का यार
हर रोज एक ही सवाल पूछकर ख़ामख़ा
उसे तंग करती थी |
सावन में जब झूला बंधता
सबसे पहले चढ़ जाती थी |
डाल पर बैठी चिड़िया भी झूला देती थी
स्कूल से लौट कर जब भूख वाली डायन
पेट पर कब्जा कर लेती तब,
पत्ते उसके झिड़क कर केरिया गिरा देते थे|
जब पड़ोस के शैतान बच्चे,
पत्थऱ फेकते उस पर तो.......
रोते हुए डाल पर बैठ कर सहलाती थी
में बढ़ी हो गई उसे भी बूढ़ा हो जाना था पर......
मर गया वो उम्र से पहले,
सुबह कुछ लोग आये थे,
लगा उसकी छाया में बैठेंगे, चले जायेंगे
पर स्कूल से में लौटी तो देखा , वो मरा पड़ा था
चिड़िया भी उदास शक़्ल लिए ईंटो पर बैठी थी
आरी पर उसका खून साफ़ चमक रहा था
जहाँ दफनाना था उसको "दीवारें चढ़ा दी"
छाया की जगह छत ने लेली
अब रोज शाम को उसकी जगह पर ...
एक अंकल कुर्सी लगा कर बैठ जाते है
में आज भी अंकल की तरफ देखकर
वही सवाल करती हूँ, चलो बताओ पहले
"पेड़ आया या बीज" वो भी चिढ़ जाते है
( आयुषी भंडारी)


