तू चल 

में तेरे साथ चलूँगी

तू लड़खड़ायेगी, में संभाल लुँगी

तू कभी अकेली थी ही नहीं

इस वीराने सँसार में

तू ढूँढती रही साथ हरदम

इधर -उधर तीतर- बितर होकर

हरदम खोजती रही अपनापन

वो कन्धा जिसपर सर रख रो सके

वो आँखे जिनसे आँखे मिलाकर

दिल की बात कह सके

वो ठोकरे ,वो रिश्तों की जंजीरे

वो सच में थी नहीं ,तूने ही

भावनाओं से जकड़ रहा था

आज वक्त है संभलने का

बाजुओं के पूरे बल से 

इन सलाखों को तोड़ने का

में साथ हुं,तू देख तो सही

अपने प्रतिबिंब को जरा समझ तो सही

 क्यों बाहर ढूंढती है, में तुझे अंदर मिलूँगी

 तेरे नाम की ,तेरे अस्तित्व कि सार्थकता में

 "में तेरी ही तो अंतरात्मा हुँ

 क्यों तुझे ना समझूँगी"

 तू चल में तेरे साथ चलूँगी

 कवियत्री -आयुषी भंडारी