अक्षरों की बेड़ियाँ कसी हैं, अब अनुभूतियों के द्वार पर,
लौट रही हैं मूक प्रार्थनाएँ, टकराकर नभ के किनार पर।
तम-जाल अब है बिछ गया, प्रत्यक्ष के इस सार पर,
थकित हो आ बैठ गई साँझ, मेरी टूटी पतवार पर।
ढल रही आयु की संध्या अब,पर समय अरुण-सा उगता है
मानव का तन थक जाता है,पर काल कहाँ कब रुकता है?
हम बंधे नियम की कड़ियों में, वह मुक्त गगन का स्वामी है,
हम संकुचित क्षणभंगुर राही, वह अनथक अंतर्यामी है!
