रोड पे कहीं तो कभी चौराहे पर दाम उनका लगाते हो मंडी से किसी तरकारी की तरह रोज खरीद कर लाते हो रात में कहीं सीना ताने अपना बाहुबल आजमाते हो और सुबह होते ही उसे वेश्या कह कर बुलाते हो उसके मन को न पढ़ कर उसकी न को ठिठोली मानते हो दुत्कार के कभी तो कभी प्यार से अपनी हवस मिटाना चाहते हो और फिर समाज में चौड़े होकर तुम मर्द कहलाते हो दूर कहीं एक वेश्या पर तुम झूठा अधिकार जमाते हो उनके सजने को तुम उनकी हामी मानते हो उनकी मजबूरी से तुम अपनी मनमानी करते हो भूल जाते हो ये क्यों तुम इंसानों की दुनिया में वो रोज़ जानवर सहती है अपने बच्चों को पालने के लिए वो अपना जिस्म काटती है काम वो भी वही करती है बस फर्क सिर्फ इतना है कि वो खुद के लिए नहीं अपनी मौत के लिए जीती है