
रोड पे कहीं
तो कभी चौराहे पर
दाम उनका लगाते हो
मंडी से किसी तरकारी की तरह
रोज खरीद कर लाते हो
रात में कहीं सीना ताने अपना बाहुबल आजमाते हो
और सुबह होते ही उसे वेश्या कह कर बुलाते हो
उसके मन को न पढ़ कर
उसकी न को ठिठोली मानते हो
दुत्कार के कभी तो कभी प्यार से अपनी हवस मिटाना चाहते हो
और फिर समाज में चौड़े होकर तुम मर्द कहलाते हो
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