अब ना हमको माल-ओ-ज़र चाहिये
अब फक़त उनकी इक नज़र चाहिये
इक चाहत है क़ल्ब में जीने की,
होनी पूरी वो ही कसर चाहिये |
हर्फ-ए-तमन्ना हों सच या ना हों,
जो मिले वो उम्र भर चाहिये |
साक़ी मिले ऐसा जो कि पीता ना हो,
जाम भर कर हमें रात भर चाहिये |
मिलना हमसे राहों में यूँ होता नहीं,
मुक़म्मल उनके संग इक सफर चाहिये |
अब क्या "आशिक" जीये बिन जीये उनके बिन !
जीने को ज़िन्दगी, हमसफर चाहिये |