रश्क़-ए-क़मर कहूँ या कहूँ मैं चाँद तुम्हें ? क्या मैं कहूँ, क्या ना कहूँ ऐ जान तुम्हें ?   कैसा जादू तूने मुझपे कर है दिया ? कहते लोग सुजान, मेरी जान तुम्हें |   मैंने कहा अग्यार से पूछो मेरा पता, लोगों ने कहा, वो कह रहे अन्जान तुम्हें |   सफ़ीना मेरा उजान में कुछ यूँ है फँसा, दे दूँ चप्पू या दे दूँ मैं जान तुम्हें ?   दे दी तूने मुझको वफा के बदले जफा, खुद को दूँ अस्क़ाम या करूँ बदनाम तुम्हें ?   मुझसे बिछड़ कर तेरे बारे में है ये सुना, कह रहे हैं सभी बेजान तुम्हें |   आवारा हवा को चाहने वालों सुन लो तुम, अच्छे-बुरे की है नहीं पहचान तुम्हें |   इशरत-ए-रफ़्ता “आशिक” मुझको याद आये, अहज़ान दूँ खुद को या दूँ इल्ज़ाम तुम्हें ?