थपक-थपक के वोह जो बच्चों को सुलाती है
रात भर जाग कर रातों को रात वोह बिताती है
सुलाती है बच्चों को ममता की आँचल में,
अपने भले ही ज़मीं पर सो जाती है ।
फूँक लेती है उंगलियों को रोटी सेंकने के बाद,
वोह माँ ही है जो इतनी तक़लीफ सह जाती है ।
घर में रोटियाँ हों तीन और चार खाने वाले,
‘मै खा चुकी’ ऐसा झूठ वोह कह जाती है ।
करता हूँ जब कभी भी गलतियाँ अक्सर,
गुस्से में भी वोह मुझको हँसाती है ।
जब उसका बेटा रहता हो दूर उससे कहीं,
रोती है अकेले में,अश्क़ अपने छुपाती है ।
होता हूँ जब कभी किसी मुसीबत मे मुब्तिला,
बिन बताये ही वोह मेरी परेशानी जान जाती है ।
करती है फिक़र ! पर खबर नही होने देती,
इस तरह वोह प्यार अपना मुझपे जताती है ।
रखती है ख़्याल शिकम से उम्र भर तक बच्चों का,
और आखिर में वोह तन्हा सब को छोड़ जाती है ।
माँगें पूरी करते-करते बच्चों की अकसर,
ख्वाहिशें उसकी सारी अधूरी रह जाती है ।
दुनिया में सबसे बड़ी सक्रियक तो माँ है,
जो तक़लीफें अपनी सारी सबसे छुपाती है ।
“आशिक़” भला कैसे तेरा कर्ज़ चुकाये मेरी माँ ?
इतना कुछ देती है और मुझसे कुछ ना तू चाहती है ।