रश्क़-ए-क़मर कहूँ या कहूँ मैं चाँद तुम्हें ?

क्या मैं कहूँ, क्या ना कहूँ ऐ जान तुम्हें ?


कैसा असर तूने मुझपे कर है दिया !

कहते लोग सुजान, मेरी जान तुम्हें |


सफ़ीना मेरा उजान में कुछ यूँ है फँसा,

दे दूँ चप्पू या दे दूँ मैं जान तुम्हें ?


मुझसे बिछड़ कर तेरे बारे में है ये सुना,

कह रहे हैं सभी बेजान तुम्हें |


आवारा हवा को चाहने वालों सुन लो तुम,

अच्छे-बुरे की है नहीं पहचान तुम्हें |


इशरत-ए-रफ़्ता “आशिक” मुझको याद आये,

अहज़ान दूँ खुद को या दूँ इल्ज़ाम तुम्हें ?

--------------------------------------------------------------

रश्क़-ए-क़मर : चाँद भी जिससे जलता हो (चाँद से भी ज़्यादा खूबसूरत)

सुजान : जादूगर

सफ़ीना : पानी का सफ़र

इशरत-ए-रफ़्ता : ख़ुशी के पल

अहज़ान : तक़लीफ़