रश्क़-ए-क़मर कहूँ या कहूँ मैं चाँद तुम्हें ?
क्या मैं कहूँ, क्या ना कहूँ ऐ जान तुम्हें ?
कैसा असर तूने मुझपे कर है दिया !
कहते लोग सुजान, मेरी जान तुम्हें |
सफ़ीना मेरा उजान में कुछ यूँ है फँसा,
दे दूँ चप्पू या दे दूँ मैं जान तुम्हें ?
मुझसे बिछड़ कर तेरे बारे में है ये सुना,
कह रहे हैं सभी बेजान तुम्हें |
आवारा हवा को चाहने वालों सुन लो तुम,
अच्छे-बुरे की है नहीं पहचान तुम्हें |
इशरत-ए-रफ़्ता “आशिक” मुझको याद आये,
अहज़ान दूँ खुद को या दूँ इल्ज़ाम तुम्हें ?
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रश्क़-ए-क़मर : चाँद भी जिससे जलता हो (चाँद से भी ज़्यादा खूबसूरत)
सुजान : जादूगर
सफ़ीना : पानी का सफ़र
इशरत-ए-रफ़्ता : ख़ुशी के पल
अहज़ान : तक़लीफ़


