आँखों को मीसे-मीसे खोजूँ पर मिल ना पाये

गाँधी के जैसा गाँधी कोई ला के तो दिखाये ।


था दुब्ला-पत्ला वोह पर इरादों का था पक्का,

वो जोश-ओ-जुनूँ मुझको तो अब दिख नही पाये ।


मुसीबत की वो घड़ी थी,हाथों मे इक लकड़ी थी,

साबरमती के सन्त सा कोई ला के तो दिखाये ।


‘भारत छोड़ो अंग्रेज़ों’ की सदा जिसने बुलन्द की,

वो ताक़त और वो हिम्मत कोई ला के तो दिखाये ।


स्वतन्त्र हुआ था भारत,क़िस्मत चमक उठी थी,

भारत की सोयी किस्मत कोई फिर से तो जगाये ।


इक बाग़ है ये भारत और हम फूलों के जैसे,

इस बाग़ का वोह माली हमको नज़र नही आये ।


उसके जीवन का हिस्सा,था सत्य-व-अहिंसा

मानवतावादी जीवन कोई जी के तो दिखाये ।


याद आती है बापू की हमको तो शाम-ओ-सुबह,

आँखों से गिरते आँसू कोई कैसे रोक पाये ?


तारीफ़ उस बापू की शब्दों में ना बयाँ हो,

अगर मैं लिखने बैठूँ तो शब्द कम ही पड़ जायें ।


गाँधी यूँ तो दुनिया में कितने जी रहे हैं,

पर चरखे वाला गाँधी कोई कैसे दे भुलाये ?


महसूस तो मुझको हर पल यही होता है,

गाँधी तो हैं ज़िन्दा पर वोह हमको दिख ना पायें ।


यादों मे अब उनकी “आशिक़” तो ये कहता है,

गाँधी के जैसे जीवन अपना हर कोई बिताये ।