दूर से वोह मुझे सताती है
देख कर यूँ वो मुस्कुराती है
पास जाने की कोशिश करता हूँ,
पास जाते ही दूर चली जाती है |
उसके नैना है मृग-नयन जैसे,
सारी दुनिया उनमें समाती है |
चाँद भी चमकना भूल जाता है,
बिन्दी माथे पे वोह जब लगाती है |
उसकी काया का कोई मेल नहीं,
हुस्न से सब को वोह जलाती है |
उसके “आशिक” ना जाने कितने हैं प्रेमीेे !
हर किसी से वोेह दिल लगाती है |


