बनके मेंढक फिर से वो फिरने लगे हैं

आ गया चुनाव ! नेताजी दिखने लगे हैं


नफरतों के दीये जिनके लिए जलाते थे !

उनसे भी मुहब्बताना अब वो मिलने लगे हैं |


यूँ वादे-ही-वादे करते चुनाव के वक़्त !

कि वादे भी सब अब सपने लगे हैं |


संविधान को भी दरकिनार कर !

लोकमत रुपयों में बिकने लगे हैं |


जीत की चाह में "आशिक" कुछ ऐसा कर रहे !

जितना हैं गिर सकते, उतना वो गिरने लगे हैं |