चाँद हमेशा तो पूरा नहीं रहता ना?
माफ़ी भी नहीं मांगता कभी अधूरा होने की।
कितनी दफ़ा हार भी तो जाता हैं ना अन्धेरे से।
तब भी आ ही जाता हैं फिर से
ये बताने कि रहेगा हमेशा हर रात हमारे साथ।
खुद अधूरा होकर भी पूरा साथ निभाता हैं।
ऐसे ही मैं भी तो होती रहती हूं, कभी पूरी तो कभी अधूरी
तो क्या मैं माँगू माफ़ी मेरे अधूरेपन की?
क्या ये काफ़ी नही हैं कि अधूरी होकर भी मैं निभाउंगी पूरा साथ?
