तुमसे माशूक थी तो कितना अच्छा था, वक़्त चुरा के मिलते दोनों, पहरों एक दूसरे के कंधे पर रख सर, किया करते थे बाते हम, प्यार की,खुमार की मिलने मिलाने की तुम डांटती तो भी सिर्फ इसीलिए, वक़्त पे क्यो नही आया मैं मिलने को, डूबता चाँद भी कितना अच्छा लगता था, जैसे सारी मय की मदहोशी ले ली हो इसी ने, ज़मानें की, अब शरीके हयात हो तुम मेरे वही दोनों हम है, अब इश्क़ नही दोनों के बीच क्योकि इश्क़ कर लिया तुमने घर से, अहसास ही बाकी है सिर्फ ज़िम्मेदारीयों का, बस नमक, तेल, आटा इसके अलावा कुछ बात ही नही होती, अब भी डांटती हो तुम, पर सिर्फ इसलिये, गैस सिलेंडर करवा नही पाया बुक क्यों मैं, डूबता चाँद अब मदहोश नही लगता, अजीब सा डर ही पैदा करता है दिल में तुम धीरे से कंधे पर हाथ रख कर कहती, ज़रा देखो रात होने आयी,बच्चे लौटे नही, अब तक घर को, हम दोनों अब कहीं नही रहें बस किरदार ही रह गए है, दिन में कितनी बार बदलतें है, कहानी के हिसाब से, हम माशूक ही रहते तो कितना अच्छा था |