बहुत शतरंजी है जिंदगी, कदम कदम पर "चेक" देती है मुझको, मैं भी किसी मंझे खिलाड़ी सा, बचता हूँ इसकी मात से, कभी सफेद तो कभी काले खानों में जाकर, पर माहिर है ये मुझसे कुछ ज्यादा, शतरंज के खेल में, जाने कितने खिलाड़ियों को, जिनको गुमां था, शातिर होने का इस खेल में, ज़िन्दगी से ज्यादा, शिकस्त दी है इसने, इसको तजुर्बा है मात देने का, मुझे ज़िद है न हारने की, पर अब तक.... भटक रहा हूँ, सफेद स्याह खानों में, कि एक मौका मिले मुझें, तो "मेट" में दूँ, इस ज़िन्दगी को।