ये जो खिड़कियों पर आहट सी है,
लगता है दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी है।
मुश्किलों के साथ उठना बैठना जो है अब हमारा,
तो दरवाज़े पे कौन होगा?
कर्ज़दार?
या अपने लतीफ़े की खोज में आया होगा कोई मसखरा।
पर दिल मेरे,
यूँ जिंदगी के दरवाज़े पर नाउम्मीदी की ये साँकल ना चढ़ा।
कि डाकिये भी आज कल मनमौजी से हो गए हैं,
क्या पता लायें खुशियों की चिट्ठियां तुम्हारे इत्मीनान और यक़ीन के इतवार को।


