सुनो, ये बताओ

ये जो लफ़्ज़ तुम कम खर्चते हो आजकल,

कितनी खामोशियों ने तुम्हारी ज़बान का दम घोटा है इससे पहले?

सुनो, ये बताओ

ये जो तुम रिश्तों से दूर समझते हो आज़ादी अपनी,

अपनी कितनी आज़ादियों को रिश्तों की जंजीरों के हवाले किया था इससे पहले?

काँपे जो लब तुम्हारे तो,

सुनो, तुम ये बताओ

ये जो सिमटे सिमटे से रहते हो तुम आजकल,

कितनी दफ़ा रेत से बिखरे हो टूट के इससे पहले?

मुश्किल लगे ग़र अपने टुकडों का हिसाब लगाना,

फिर सुनो, ये बताओ

ये जो हर हाँ तुम्हे हाँ और ना तुम्हें अब ना लगती है,

अपनी कितनी ख्वाहिशों को दफना चुके हो इससे पहले?

जो ढूंढ पाओ जवाब किसी किताब में,

सुनो तुम ये बताओ,

जो अब पत्थर सा हो गया है दिल तुम्हारा,

कितनी दफ़े इस मोम को पिघला चुके हो इससे पहले?

ये जो नया सा चेहरा दिखता है तुम्हारा आजकल,

कितनी उदासियों पे ये उजली मुस्कुराहटों की परतें चढ़ा चुके हो इससे पहले?

बचते रहते हो जो तुम इतना हिसाब से आजकल,

कितने जज़्बातों का मोल भाव करके आये हो इससे पहले?