महलों के एक कोने बराबर भी नही है,
मगर रौनकें महफ़िलो जितनी रखता है।
ये मेरा छोटा सा घर,
मुझे लाखों महलों से अच्छा लगता है।
माना चिरागों की रौशनी से महरूम रह जाता है,
मगर सितारों की छाँव बटोर कर रखता है।
संगेमरमर तो दूर की बात है, ये तो ईंटो को भी तरसता है,
हज़ार कमियों के बावजूद ये दिलदार इतना है
कि मिट्टी की सौंधी खुशबू बिखेर कर रखता है।
ये मेरा छोटा सा घर,
मुझे लाखों महलों से अच्छा लगता है।
ये दादी के ज़माने का नीम,
जिसपे नन्ही चिड़िया करती दानों की तक़सीम।
ये चिड़ियों का राग,
तंगी के शोर से हिसाब बनाये रखता है
ये मेरा छोटा सा घर,
मुझे लाखों महलों से अच्छा लगता है।
पुरे आँगन में बेतरतीबी से फैली है,
तमाम बचपन की यादें मेरी।
और मेरे वापस जाने के ग़म में,
थोड़ी ग़मगीन सी सिमटी हुई बैठी है माँ।
ज़मीन के छोटे से टुकड़े में सिमटी बेशुमार दौलत,
मुझे माँ का वो दुलार अच्छा लगता है।
ये मेरा छोटा सा घर,
मुझे लाख महलों से अच्छा लगता है।
