नानी कहती रहती थी वक़्त बे वक़्त,
जहाँ तहाँ बैठी हुई,
बाँटो।
भाई बहन के साथ प्यार बाँटो,
माँ के काम में हाथ बाँटो,
चोट जो लग जाये तुम्हें,
तो दुःख अपना चींटी के साथ बाँटो,
दर्द ग़र ज्यादा हो तुम्हें,
तो धरती माँ संग आँसू बाँटो।
हम बुजुर्गों की उम्र रेत सी हो चली है,
हमारे साथ अपना वक़्त बाँटो।
फिर बाँटते बंटते इसी वक़्त ने बाँट दिया,
मुझे, नानी को, सुलझी गाँठों सी उनकी नसीहतों को भी,
जब वक़्त की रेत बस उँगलियों भर बची थी उनकी,
तब खुद से बुदबुदाती रहती थी नानी,
"क्या कह रहीं हैं आप" माँ के पूछने पे,
बस मुस्कुरा देती थी।
फिर एक दिन मुस्कुरा के बोली,
अब धरती की आवाज़ें सुनाई नहीं देती मुझे,
और चीटियाँ को ये आँखें टटोल नही पाती।
पर दर्द है तो,
खुद से खुद का ही दर्द
बाँट रही हूँ।
नानी ने मुझसे कहा था, मैं तुमसे कहती हूँ,
जब कहीं छाँव ना दिखे,
और रौशनी ने मानो पूरा घर दे दिया हो अँधेरों को।
जब न सुनने वाला हो कोई,
और ख़ामोशी का शोर हर आवाज़ को दरकिनार कर दे,
तो दो घड़ी बैठना,
और खुद से खुद का दर्द,
बाँट लेना।


