उसने कहा, " बैठ जाओ, तुम किसी लायक नहीं हो।"


मैं बैठ गयी। बात उसकी मान गयी

अपनी क़ाबिलियत को, उसकी तराज़ू़ में माप गयी


ख़ुद से नावाक़िफ़

इस बात से ना-मालूम 


कि रेशे रूह के, रौशें बन रहे थे

कि जिल्द से मेरी, फूल खिल रहे थे