कौन हो तुम, कहाँ से आयीं हो,
यूं इस कदर, दिल-ए-महफ़िल में छायी हो।
हवा के झोंके में कोई खुशबु हो जैसे,
पल दो पल महकाने इस ज़िन्दगी को,
तुम अपने साथ ये सपने रंगबिरंगें अनगिनत लायी हो।
तुम्हारे एहसासों में एक अज़ब सी ताज़गी है,
जैसे ज़िन्दगी की कोई अधूरी कहानी हो,
जिसे भूल आया था मैं कहीं
उस दास्तान-ए-इश्क़ की, कोई निशानी सी है।
तुम्हारी ये ज़ुल्फ़ है या काली घटाएं हैं
जो इस चाँद से चेहरे को छुपाये है,
गिराते हुए बिजलियाँ इन अक्शों से,
ये किसी मेहबूब के लिए प्यार से की गयीं अदाएं हैं।
ये प्यार भरी आँखें मन को मदहोश करती है,
उतर कर इस दिल में ये शोर बहुत करती हैं।
सोचता हूँ डूब ही जाऊ मय के इन प्यालों में,
कर दूं अपनी हस्ति नीलाम गुलाबी होंठो के इन मयखानों में।
चाँद से इस रोशन चेहरे में, मुझे खुदा का नूर नज़र आता है।
करता हूँ तुझे अपनी बंदिगी अता, हे खुदा, मुझे तुझमें
अपने मेहबूब का हुस्न-ए-सुरूर नज़र आता है।


