नींद का अपनी क्या कहिए
नींद से अपनी क्या कहिए
अपना समझौता है
बिन लिखा सौदा है
बुलाएं चली आती है
सौदे की शर्तें निभाती है
सोई आँखों की जाग
या जागे सपनों की तंद्रा
नींद मुझे बहलाती है
बाहों में दुलराती है
भूलाती है पल भर में
क्रूर समय के राग द्वेष
झूठे स्वार्थों के छद्म वेश..
~अक्षिणी
