कितना तन्हा हो गया हूँ, अपनों के होते हुए ,
देख नहीं सकता हूँ लेकिन, अपनों को रोते हुए।
जितने भी हैं जख्म इस दिल में, सब अपनों के दिये हुए,
फिर भी आज तक बैठा हूँ मैं, बस होंठों को सिये हुए।
बोलता नहीं हूँ ज़्यादा, सबकी बात सुनता हूँ,
बिना किसी गलती के ही, गुनेहगार बनता हूँ।
हर बार हरेक इल्जाम को, हँसकर मैं सह जाता हूँ,
मेरी ही गलती है शायद, खुदको ये समझाता हूँ।
मेरे सारे अपने मुझको, बेगाने से लगते हैं,
आलम कुछ ऐसा है कि, हर शब्द ताने लगते हैं।
कभी-कभी तो इन आँखों में, आँसू भी आ जाते हैं,
फिर भी जुल्म मेरे अपनों के, बस बढ़ते ही जाते हैं।
अब पानी सर से ऊपर है, हरेक को जवाब देना है,
पर मेरे तो सब अपने हैं, इनसे क्या बदला लेना है!
भूल जाता हूँ सारी बातें, रात को मैं सोते हुए,
देख नहीं सकता हूँ लेकिन, अपनों को रोते हुए।
धन्यवाद!

