"तुम"


वो याद है तुम्हें, तुमने जब अपनी झूकी हुई पलकें उठाकर मेरे आंखों से मिलाकर वो आलम खामोश कर दिया था और जब बिना कुछ कहे वो ख़ामोशी आंखों से उतरकर दिल में इश्क धड़का दे


वो फिज़ा हो तुम..


लिखी जाती है जब देख के चांद तारों को शायरी, उस शायरी में गुजरी हसीन वो निशा हो तुम।


अरे तुमने पुछा था ना कि क्यो पढ़ते रहते हो इन शायरों की शायरी, खैर!! अब तुम्हें क्या बतलाए कि उन्होंने जो लिखा है वो लिखा हो तुम..


जिसके होने पर इतराने लगे भला वो नासमझ इश्क भी वो अदा, वो निका हो तुम।


काश कि वो किताबों का इश्क पूरा होता, उन अधुरे इश्क के अल्फाजो में झलकती वो वफ़ा हो तुम..


मेरे इस इक-तरफे प्यार के तलब को जो बढ़ाते जा रहा है, मदमस्त वो नशा हो तुम।