इंसानियत से महरूम होते इंसान को देख
छटपटाती है ज़िन्दगी, दिल परेशान होता है,
गगनचुम्बी इमारतों तले सब ज़ज़्बात दफना दिये
बगैर सुकून के भी भला कोई मकान होता है,
भीड़ के आतंक से दम तोड़ता रहा वो शख्स
खामोश रहकर कैसे उस भीड़ में 'इंसान' सोता है,
कराहती है वह आधी आबादी अंधेरे रास्तों पर
'देवी' को पूजने वाले देश में भी आदमी सब्र खोता है,
गुरूर में खुद को ही आँखों से गिरा बैठता है 'अवनि'
सभ्य समाज के भीतर भी कोई असभ्य हैवान रोता है !
~ आकांक्षा दुबे 'अवनि'


