वो स्कूल की शर्ट

हर रोज़ धुलती थी

आज बंद पड़ी अलमारी में

अब सुबह अधूरी सी

पहले स्कूल जाने की तैयारी में


जिस अलार्म को देख कर

पहले होती थी चिड़

अब वही अलार्म देख सोचा करते

क्या समय होगा पहले जैसा फिर


हाथ में बोतल,कंधे पे बैग

और मुँह में रोटी

इन यादों में खोजाना

बन गयी मेरी फ़ितरत और कसौटी


टिफ़िन में माँ देती

कभी राजमा , कभी छोले

एक डिब्बे पे सबका हाथ

क्या फिर हम होंगे एक साथ


मुझसे बड़ा मेरा बस्ता

और बस्ते का वो बोझ

आज मेरा मन तरसता

उठाने के लिए वो बस्ता रोज़


पहले स्कूल से आने पर

सने -गंदे हुआ करते जूते

अब ऐसी यादों का मज़ा

सिर्फ़ सपनो में ही लूटे

~ आद्या प्रभात (Aadya Prabhat )