आज मैं सुनाने जा रही,

एक बहुत बड़ी युद्ध गाथा

जब ये सुनोगे तो ,

घूम जाएगा तुम्हारा माथा ।


हम से एक दिन पूछा गया,

कितना होता हैं दो दूना (चार)

उत्तर तो हमको आता नहीं,इसपे हँसने लगा गणित,

हम से सहा नहीं गया ये अत्याचार ।


हमने कहा जय माता दी, और लगाया तुक्का

दो दूना होता हैं सात !

गणित फिर हमपे हँसा,

लगा जैसे गणित ने हमको मारी लात ।


उस दिन से ना गणित को हम,ना हम को गणित पसंद ,

बन गया हमारा छत्तीस का आँकड़ा ,

अब तो युद्ध हो के रहेगा

बस बीच में कल था खड़ा ।


आ गयी वो घड़ी ,

युद्ध भूमि था परीक्षा भवन !

हम हारेंगे, हम हारेंगे ,

 ये कहने लगा हमारा मन ।


प्रश्न पत्रिका पकड़ते ही,

गणित ने किया अपना वार,

हम भी अपने कलम और भूसे दिमाग़ के साथ

कुछ-कुछ थे तैयार ।


गणित ने हमको बहुत झुँझलाया,

आख़िर में हमको आया एक सुझाव,

तभी बजी ज़ोर से घंटी ,

जीत गया गणित,और खतम हुआ पड़ाव ।


अब कभी ना लेंगे, गणित से पंगा,

पकड़ते हैं हम अपने कान !

हम आख़िर पिछड़े ही ,

और गणित बड़ा बलवान ।


     ~ आद्या प्रभात