खुद से अगर किसी चेतना का अन्त करना हो,
तब वो अन्त निर्धारित करता हैं,
उसे अनन्त होना हैं या सूक्ष्म होना हैं,
उसी से आगे हो रहे निर्माण, निर्धारित हो जाते हैं।
किसी चेतना को सूक्ष्म,
बनाने की प्रक्रिया,
में जिस हद्द(आदत) तक की,
यात्रा हो वो तुम्हे क्या देती हैं,
वो उस हद्द पे निर्भर करता हैं,
वैसे ही चेतना के निर्माण के लिए,
वो काम मे आती हैं।
क्योंकि समय सीमित हैं,
जहाँ सही हो,
अगर वहाँ कुछ गलत हैं,
तो वो सच्चाई किसी काम की नहीं,
इसलिए अंत जरूरी हैं।
जैसे कुछ चेतनाओं को,
निर्माण दिया जाता हैं,
वैसे ही कुछ चेतनाओं को,
सूक्ष्म भी किया जाता हैं।
जैसे कुछ चेतनाओं को,
अंत दिया जाता हैं,
वैसे ही कुछ चेतनाओं को,
अनन्त भी किया जाता हैं।
©आदित्य नारायण शाक्य


