उन धड़कनों को जानना हैं, जो धड़कनों की जान हैं,

कही-कही कुछ धड़कन थी, तो कही-कही कुछ और धड़कन थी,

कुछ-कुछ धड़कने, कुछ-कुछ जानने के सहारे, कुछ-कुछ से जुड़ने का एहसास दे,

तो कहीं कुछ-कुछ धड़कने, कुछ-कुछ जानने के सहारे, कुछ-कुछ के त्याग का एहसास दे,


यूँही कुछ-कुछ के संघर्ष से, कुछ-कुछ का संघर्ष, ज्ञान बने।

यूँही कुछ-कुछ के संघर्ष से, कुछ-कुछ का संघर्ष, समझ बने।

यूँही कुछ-कुछ के संघर्ष से, कुछ-कुछ का संघर्ष, चेतना बने।

यूँही कुछ-कुछ के संघर्ष से, कुछ-कुछ का संघर्ष, एहसास बने।


वो भी खड़ा था मैदान में, में भी खड़ा था मैदान में।

उसके होने का एहसास ऐसा था, की मुझे एहसास करा गया।

मेरा होने का भी एहसास ऐसा था, की उसको एहसास करा गया।

कुछ-कुछ के जुड़ने का, तो कुछ-कुछ के त्याग का एहसास करा गया।


जब-तक धड़कन हैं, तब-तक एहसास भी रहेगा ही,

कुछ-कुछ के जुड़ने का, तो कुछ-कुछ के त्याग का एहसास रहेगा ही,

इन धड़कनो की यात्रा ही वहीं तक हैं, जब तक ये एक न हो चले,

जैसे ही ये एक हुई नहीं, की यात्रा पूरी हुई।


धड़कन-धड़कन न रहे के, संघर्ष का एक योगदान बने।

ज्ञान, समझ, चेतन के संघर्ष की सामग्री बने।

प्राकर्तिक परिक्रियो की ऊर्जा बने।

समय को नए रंग और रूप में जोड़े और जुड़े।


©आदित्य नारायण शाक्य