आईने की कैद
परछाइयों की कैद,
मैं पहचाने निकला,
भाव के दर्पण को ||
भूल बैठे की,
सत्ता तो अभी,
परछाईयों की हैं ||
परछाइयों ने,
तोड़ के दर्पण,भाव को बनाया बंदी ||
टूटे दर्पण की,
पहचान लिए,
मैं बैठा सुबह-शाम ||
कष्टों की,
परछाइयों लिए,
भाव रहा बंदी ||
परछाइयों के,
पालन-पोषण हेतु,
भाव रहा बंदी ||
दर्पण की परछाई को,
मैं मान बैठा सच,
अभाव में पिरोया कष्ट ||
©आदित्य नारायण शाक्य

