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मज़हब अलग है


मज़हब अलग हैमतलब अलग है

अलग है हमारी ज़ात आदिबपहलू अलग है

ज़बान अलग हैअलग है अपनी हर बात आदिब

जब कुछ नहीं नहीं मुतालिक हम मेंफिर क्यों उमड़ते हैं ये जज़्बात आदिब

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