थक गया था  सालों मैं चल कर, जिन्दगी के सवालों को हल कर । सैंकड़ों वर्षों का ईनाम मिल गया, गुमनाम को फिर नाम मिल गया । दिये से अन्धकार दूर हो गया, झूठ का शहर चूर चूर हो गया पथिक को रात्री में धाम मिल गया, गुमनाम को फिर नाम मिल गया ।