जहाँ चाह थी सदियाँ जीने की, वहाँ जीने को चंद पल मिले, जब उम्मीद जगी फैसले की , तब इन्तजार के नए कल मिले , गहराई से देखा जब नज़र को उसकी, न प्रश्न दिखे न हल मिले, सब तिलिस्म था मेरे दिलमाली का, न गुल खिले न फल मिले. . . . .