क्यों बगावत नही कर देते तुमसे ये झुमके ये बाली ये कजरा ये गजरा
क्या तुम्हें देख कर इन्हें खुद पर गिला नही होता मैं ताउम्र खुद के ही गुरुर में गुजार देता जो तुमसे मिला नही होता।
मैंने देखी है तुम्हारे हाथों से रोशनी निकलते हुए
जो तुम न छूती तो वो गुलाब खिला नही होता
मैं ताउम्र खुद के ही गुरुर में गुजार देता जो तुमसे मिला नही होता
वो आबे-ए-चश्म जो गालो से होकर लबो को चूमता है
गर आँखों से नही निकलता तुम्हारी तो इतना चमकीला नही होता
मैं ताउम्र खुद के ही ........
एहसास न हुआ पर वक़्त ने उधेड़ कर रख दिया था मुझे
बड़ा बेतरतीब सा दिखता मैं जो तुमने सीला नही होता
मैं ताउम्र खुद के ........
कभी हवेलिया थी अब खानाबदोशी का आलम है
कही पनाह दे दो खुद में, ज़ुर्म-ऐ-इश्क़ में जिला-बदरो का कोई जिला नही होता
मैं ताउम्र खुद के ही ........
ये समझदारी, ये किताब की चार बाते अलग है
मैं अनपढ़ ही राह जाता जो तेरे दिल मे दाखिला नही होता
मैं ताउम्र खुद के ही ........
जुगनू सब नाराज़ है अब अंधेरी रातें नही होती
तुम आफताब जो बन गयी हो, गर झुठ कह रहा हु तो तुम्हारे पीछे ये काफिला नही होता
मैं ताउम्र खुद के ही गुरूर में गुजर देता जो तुमसे मिला नही होता।


