माँ, इतवार के दिन सुबह-सुबह

फूलों और बेलों की बनावट वाली थाली लिए

उस लम्बी सी गर्दन वाली केतली से

एक-एक कर प्यालों में परोसती

वह अदरक के स्वाद वाली गर्म-गर्म चाय


पापा, चश्मा लगाए

हाथ में अखबार लिए

गंभीर भाव से पढ़कर सुनाते

देश भर का हाल

फिर अस्वीकृति से कहते

यह नेता सभी एक से हैं


छोटी बहन और मैं

एक ही प्याली में

अपना-अपना Parle -G डुबोकर खाते

और सही समय तक

बिस्कुट डुबोये रखने की

अपनी कला को निखारते



कभी अख़बार में छपे

बाल-चुटकुलों पर

ठहाके लगा कर हँसते

कभी फिल्मो की समीक्षा

कभी अपना भविष्य पढ़ते


कहीं रेडियो पर गीतमाला में सुनाई देते

किशोर-दा के मधुर गीत

फिर शुरू होता पापा संग

किशोर बनाम रफ़ी का

वह खट्टा-मीठा तर्क-वितर्क


चाय पर चाय

बिस्कुट पर बिस्कुट

बातों पर बातें

गीत पर गीत

ठहाकों पर ठाहके


समय भी मानो जैसे

उस चाय की महक में मुग्ध

उन गीतों में खोया

उन बातों का आनंद उठाता

मुस्कुरा कर, वहीँ रुका रहता



अभी कल ही मैंने चाय का

एक अत्यंत आकर्षक पैकेट खोला

लौंग, इलायची के मिश्रण से भरी

विदेशी बागानों में बनी

एक-एक पत्ती हाथों से चुनी

सुन्दर शब्दों में लिखा था


चाय में स्वर्णिम रंगत थी

भीनी-भीनी सुगंध थी

एक विशिष्ठ सा स्वाद भी था


फिर भी न जाने क्यों मुझे वह

माँ की इतवार वाली चाय याद आयी


उस चाय में प्यार था…