अस्पताल में, फुटपाथ पर, शहर गाँवो में
श्वेत वस्त्र में लिपटे पड़े, अनेक दाहगृहो में
दिन-रात प्रज्वलित असंख्य धूमिल चिताओं में
पशुओं का ग्रास बने नदी तट पर, राहों में
निशब्द बहते मोक्ष-दायी गंगा के प्रवाहों में
अनगिनत, तिरस्कृत, अधूरे, मूक शव
पूछ रहे कबसे यही सवाल..
क्यों माँगे केवल मंदिर मस्जिद ?
क्यों न माँगे अस्पताल ?

