हम घर-आँगन सजायेंगे

पुष्प-वर्षा बरसायेंगे

कुमकुम तिलक लगाएंगे

भव्य अभिषेक करवाएंगे

आज तो राम आएंगे


जगमग-जगमग मुंडेर पर

घी के दिए जलाएंगे 

स्वर्णिम घंटियों के स्वर पर 

मन्त्रमुघ्द आरती गाएंगे

आज तो राम आएंगे


कुछ बच्चे भूखे हैं, अब भी

कुछ छतें टूटी, घड़े खाली

कुछ तन अब भी ढके नहीं

कुछ तो लिख नहीं पाते

राम-नाम भी

पर छोड़ो, यह कथा फिर कभी सुनाएंगे

आज तो राम आएंगे


कुछ साँसें हैं दूषित

बोझिल और लाचार

कुछ पड़े पीड़ित

बिन दवा, बिन उपचार

यह व्यथा, फिर कभी बताएंगे

आज तो राम आएंगे


कुछ बेटियां जन्मी ही नहीं

कुछ चक्की में समाज की, पिसी

कुछ ‘निर्भया’, समेटे देह-आत्मा

फिर रही भयभीत गली-गली

यह दृश्य भी, फिर कभी दिखलायेंगे

आज तो राम आएंगे


आज तो राम आएंगे

पर यह तो बताओ, मेरे भाई

राम गए ही कब थे


राम तो सदैव ही बसते थे

सच्ची श्रद्धा में

निःस्वार्थ सेवा में

पावन कर्मों में

मीठे बोलों में

परहित भावों में

मन-मंदिरों में

मात-पिता की

दुआओं में

तुम्हारी और मेरी

प्रार्थनाओं में!


कहत संत कबीर...

"कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढ़ूंढ़े वन माहि।

ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया खोजत नाहिं."

जय श्री राम