गिर कर उठना

उठ कर चलना सिखाया

जब पग भी धरसका और सकुचाया

तब सहज अपने कंधे पर बिठाया


स्वयं को स्वयं से लड़ना

लड़ कर विजयी होना बताया

जब विषमता से मानस घबराया

तब स्वयं को स्वयं से ही बचाया



आन पड़ी जब कोई विपदा

तब ढाल बने समक्ष खड़ा पाया

अपने पग में हो भले ही कंटक प्रखर

मेरे पथ का हर पैना पत्थर हटाया


विशाल बरगद के सामान

सदैव दी समस्त परिवार को छाया


आशीष आपका रहे सदा

मेरे शुभचिंतक, मेरे सखा

मेरे मार्गदर्शक, मेरे पिता

- अमित मेहता