अपना जीवन पूरा कर जब
उस लोक को तुम जाओगे
फिर क्या मुँह दिखलाओगे
कहो राम को, क्या मुँह दिखलाओगे !
पत्थर को कर दिया अहिल्या
खाये शबरी संग कुटिया में बेर
केवट साथ की गंगा पार
कदापि जिसने न किया भेद
ऐसे सहृदयी को तुम
जात-पात बतलाओगे
तुम क्या मुँह दिखलाओगे !
जो रहे विनीत सदैव
शत्रु को भी मान दिया
न की व्यर्थ की हिंसा
लक्ष्मण-हित,
रावण से भी ज्ञान लिया
ऐसे मर्यादा-पुरुषोत्तम को
धर्म-अधर्म समझाओगे
तुम क्या मुँह दिखलाओगे !
स्वेच्छा से जो तज चले
स्वर्णिम महल और राजपाठ
कंद-मूल फल खाकर
जिसने किया वन में वास
ऐसे तपस्वी हेतु
क्या भव्य भवन बनवाओगे
तुम क्या मुँह दिखलाओगे !
न लो केवल राम नाम
अनुसरण करो तुम राम का
सर्व गुण संपन्न है जो
आचरण करो उस राम सा
अपना जीवन पूरा कर जब
उस लोक को तुम जाओगे
राम सम्मुख जब आओगे
फिर तुम न लजाओगे
जब अपना मुँह दिखलाओगे
जब अपना मुँह दिखलाओगे…
