तुम भी फूँक डालो
अपने ह्रदय में बस रहे
ऊँच-नीच, धर्म-जात, भेद-भाव
के घिनौने, अभिशप्त रावण को
मैं भी कर देता हूँ भस्म
अपने मानस पटल पर बने
अंधकारमयी संकीर्ण विचारों का
जीर्ण- शीर्ण ,जर्जर यह महल
लेकर परस्पर सदभाव का सौंधा सा घी
आदर-आत्मीयता की नर्म बाती
नम्रता-विश्वास की उज्जवल लौ
चलो मिलकर आज
एक दिया जलाएं

