कुछ खाली पल हैं,

जो शायद खाली नहीं हैं।

पर फैलाए उड़ती चिड़िया को देख रहा हूं,

इन्हीं खाली पलो में कुछ करने को सोच रहा हूं,

कुछ करने के कुछ नए तरीके खोज रहा हूं,

एक नई आशा,

एक नई अभिलाषा,

एक नया सूरज लेकर आएगा वो पल,

बैठे बैठे यूं ही चंचल मन को टोक रहा हूं।

उन पलों को संजोने के लिए कोई प्याली नहीं है,

कुछ खाली पल हैं,

जो शायद खाली नहीं है।


मन में उठी है इक प्रभंजन,

कर रहा हूं इन्हीं पलों का मै चिंतन,

यही पल हैं जैसे चमकते कुंदन

कुछ नया सोचूं,

कुछ नया लिखूं,

कुछ नया करूं जो कि हो निरंजन,

इन पलों के कोई सवाली नहीं हैं,

कुछ खाली पल हैं

जो शायद खाली नहीं हैं।

- विकास पांडेय