नारी ही तो है "सृष्टि का सृजन है वो, मातृत्व की अधिकारी ही तो है नारी ही तो है, पैदा किया, पाला और बड़ा किया, घुटनो से चलना सिखाया और पैरों पे खड़ा किया, तन का उसने खून सुखाया, स्तन से उसने दूध पिलाया, सर्द हवाएं झेली उसने, गर्मी का हमे अहसास कराया, दूध पिया हमने उसका, तब जाकर हम मर्द बने, फिर भी दर्द दिया उसको, कितनो के हम हमदर्द बने, हर दर्द सहा उसने वो अबला है, बेचारी ही तो है, नारी ही तो है सृष्टि का सृजन है वो, मातृत्व की अधिकारी ही तो है नारी ही तो है, कभी भूख सही, कभी प्यास सही समाज की जिसने हर मार सही कभी वैश्य बनी, कभी बनी वैश्या जीने को जीवन उसने सहा नहीं क्या-क्या समाज ने ही लिखी उसकी किस्मत समाज ने ही है बिगाड़ी पुरुष होता क्यों हर बार सही स्त्री जाती क्यों हर बार लताड़ी सबका ख्याल रख सकती है वो पर नहीं कभी सवाल कर सकती है वो सबके दुखों को वो दूर करती है, दुखियारी ही तो है नारी ही तो है, सृस्टि का सृजन है वो मातृवत की अधिकारी ही तो है, नारी ही तो है, कभी पाला है माँ बन के कभी बहन सा दिया है प्यार कभी बनके वो अर्धांगी छोड़ के आयी सब संसार जनम लिया जब बेटी बनके पिता से हुआ खूब दुलार बनकर माँ, बहन, पत्नी और बेटी, खूब चलाया उसने परिवार पर न जाने किस चाहत में नारी पे हुआ इतना अत्याचार कभी बंद कमरे में झेली प्रताड़ना कभी चौराहों पे हुआ बलात्कार होगी किसी की माँ, बहन और बेटी, पर चीज वो हमारी ही तो है नारी ही तो है, सृस्टि का सृजन है वो मातृवत की अधिकारी ही तो है, नारी ही तो है,"