दोस्तों आप सबकी सेवा में मेरी नयी कविता जो एक गरीब भिखारी की पीड़ा का चित्रण करती है। कृपया इसे पूरा पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें, मैं प्रतीक्षारत हूं धन्यवाद! शीर्षक ====भूखा देवता   थाल पूजा का लिए अर्चन कोई करता रहा। और बाहर देवता भूख से लड़ता रहा।। पुष्प,धूप आरती प्रसाद मूरत को दिया सीढ़ियों के पास बैठा एक भूखा रो दिया। पत्थरों पर दूध घी सब व्यर्थ में चढ़ता रहा, और बाहर देवता भूख से लड़ता रहा।। सब खुशी से झूमते नाचते गाते रहे, ईष्ट देवों को मानते और समझाते रहे। मंत्र तीनों लोक के अंदर कोई पढ़ता रहा, और बाहर देवता भूख से लड़ता रहा।। हर किसी के सामने वह हाथ फैलता, पर घृणा,धत के सिवा वह कुछ नहीं पाता। दानपेटी देव की अंदर कोई भरता रहा, और बाहर देवता भूख से लड़ता रहा।। देवमंदिर भव्य,सुंदर है  बड़ा पवित्र है, और उसका बनाया यह मनुज अपवित्र है। दीन ही सब छूत हैं ए बात जग रटता रहा, और बाहर देवता भूख से लड़ता रहा।। कर दया गर जो किसीने चंड पैसे देदिए, तो दुआओं के हजारों फूल उसने लेलिए। है भिखारी पर दुआएं दान वह करता रहा।

और खुद बाहर खड़ा वह भूख से लड़ता रहा।।