जब शब्द सिमटने लगते हैं बाज़ारू परिभाषाओं में,
मैं अपनी अस्मिता खोजता हूँ पुरखों की भाषाओं में।
कोलाहल बहुत है बाहर,पर अंतस स्वर जब जगता है,
सन्नाटों के सिकुड़न में तब साहित्य का पंख फैलता है;
करघे से इस बुनी कथा को फिर कोई छू नहीं पाता है।
शशांक प्रिय मिश्र

