सिलसिले बातों के ग़र कम भी हो जाये

तुमसे बात करके भी तुम्हें मैं याद करता हूँ


कसम की कसौटी पर चाहे रख लो मुझे तुम

तुम्हारे नाम मैं अपनी दिल की जायदाद करता हूँ


याद के पिजड़े में कैद सी तेरी मोहब्बत

लो मैं इश्क के कबूतर को आजाद करता हूँ


तेल दीपक सी हो गई है तेरी मेरी आशिक़ी

तुझे आबाद रख कर खुद को बर्बाद करता हूँ


न हो किसी की पुरनम आँखे न तनहाई हो

मैं अपने कान्हा से बस यही फरियाद करता हूँ