एक हुजूम चला में उसके संग चल दिया
न कुछ सोचा न कुछ समझा
न कुछ जाना न कुछ खोजा
बस उसका अनुसरण करता चल दिया
एक मोड़ आया जहां कारवाँ रुका
वहां से कई लोग छंट गए
और कई ऐसे थे जो पीछे छूट गये
पर में वही पर था डटा
मुझे डर था की में कही पीछे न छुट जाऊ
कही में अकेले न रह जाऊ इस अनजान राह पर
तो मैं पूरी कोशिश, हर एक तरकीब के साथ
बस जुड़ा रहे इस हुजूम के साथ
क्योंकि मुझे मालूम नहीं था जाना कहा है
किस लिए घर से चल पड़ा हूँ मैं ?
बस एक भीड़ का हिस्सा बना रहा
सब संग थे तो मैं तना रहा
पर एक बात गजब है बड़ा सुकून था
भीड़ का हिस्से होने मे
बिना सोचे बिना समझे हंसने में, रोने में
जिस जिस ओर वो बढे
संग संग में भी बढ़ता गया
न कुछ ज्यादा सोचना होता है
न कुछ ज्यादा जानना होता है
बस पीछे पीछे ही तो चलना होता है
अब कारवाँ मज़िल के करीब था
न जाने क्यों लोगों में उत्साह अजीब था
उम्मंग थी, हर्ष था, जिसका इंतज़ार था
वो सामने खड़ा दृश्य था
पर
मेरा मन बैठा जाये अब क्या हो
इन सब का जाना होगा अपनी अपनी राह
और मुझे नहीं पता कौन सी मेरी राह
-कुलदीप
