ये कैसी "हवा" चली ,
के" शहर "जल रहा है।
अब "मासूम "कहाँ जाए ,
के हर तरफ "भेड़िया" पल रहा है।
"नन्ही सी "जान क्या कर गई ,
के ऐसा "हवस" जग रहा है।
बेगैरतों आती नहीं "शर्म",
ये सोच के "मर्द "घुट रहा है।
बाहें जो कभी "रक्षा "के लिए थी ,
के वो अब "नन्ही जान "से खेल रहा है।
ये कैसी "हवा "चली, के "शहर" जल रहा है
हर "मोहल्ले", हर "गली ",
में जैसे "शैतान "बस रहा है।
अब तो अपन "परछाई "
पे भी इंसान "शक "कर रहा है।
मसल ना दे कोई" नन्ही कली ",
के "छुपने"को कहीं दिल कर रहा है।
ये कैसी "हवा" चली के," शहर " जल रहा है।
बाग में न जाना ओ "बेखौफ" तितली,
के वहाँ "हैवान" राह तक रहा है।
दरवाजा और बंद कर लो "सारी गली ",
"वहसी" तुम्हें ढूंढ रहा है।
"मुखौटा" लगाए इंसानियत की ,
हमारे संग "भेड़िया" रह रहा है।
कब जाग जाए "जंगली" ,
के हर पल दिल "डर" रहा है।
ये कैसी "हवा " चली के "शहर " जल रहा है।