"जिंदगी ने कुछ ऐसा खेल रचाया,

खुशियों और सच्चाई के बीच में से किसी एक को चुनवाया,

किसे चुनना चाहिए?

इस असमंजस से वो छोटा सा प्राणी बहुत घबराया,

एक तरफ थी खुशियां जहां सब हसीन था,

जिनके बिना जीवन उसका नीरस था,

दूसरी तरफ थी सच्चाई,

जिसके बिना ना था उसका कोई अस्तित्व,

जिसकी थाम उंगली उसने पूरा किया था अभी तक का अपना सफर,


किसे चुनना चाहिए?

अंत में पूछ ही लिया उसने खुद से ये प्रश्न,



यूं वो फिर मन ही मन कुछ बुदबुदाया


कि मिला नजरें अपने अतर्मन से वो थोड़ा सा मुसकाया,

फिर थाम हथेली सच्चाई की उसने आखिर खुशियों को गले लगाया।"